बीमार होने पर चींटियां भी हो जाती हैं आइसोलेट: रिसर्च

कोरोना संक्रमण की शुरुआत से ही लगातार जो बात सुनने में आ रही है, वो है सोशल डिस्टेंसिंग. अब भी इस महामारी के रहस्यों से जूझ रहे वैज्ञानिक मान चुके हैं कि कोरोना के लक्षण दिखने पर दूरी बनाना ही बेहतर है ताकि संक्रमण न फैले. लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि सोशल डिस्टेंसिंग का ये कांसेप्ट सिर्फ इंसानों में ही नहीं, बल्कि मामूली समझी जाने वाली चींटियों में भी मिलता है.

ऐसे हुआ रिसर्च

यूनिवर्सिटी ऑफ लुसाने (University of Lausanne), स्विट्जरलैंड की शोध टीम ने लेसियस नाइजर (Lasius niger) प्रजाति की चींटियों पर एक शोध किया, जिसके नतीजे सोशल डिस्टेंसिंग का सीधा उदाहरण हैं. इसके लिए उन्होंने चींटियों की बस्ती जिसे कॉलोनी भी कहते हैं का चुनाव किया, जहां ज्यादा संख्या में चींटियां रहती थीं. इन बस्तियों में लगभग 2200 चींटियों की रिहाइश थी. यहां पर इंफ्रारेड कैमरा लगाया गया ताकि उनकी हर एक गतिविधि पर नज़र रखी जा सके.

इसके बाद लगभग 10 फीसदी चींटियों को Metarhizium brunneum यानी एक ऐसे फंगस के संपर्क में लाया गया जो चींटियों में बीमारी फैलाने का काम करते हैं. शोधकर्ताओं ने इस फंगस का लो डोज उन्हें दिया ताकि वे मरे नहीं सिर्फ उनकी काम करने की क्षमता कम हो जाए. वैसे आमतौर पर इस फंगल इंफेक्शन से चींटियों की एक से दो दिनों के भीतर मौत हो जाती है.

बीमार चींटियां हो जाती है अलग

ऑस्ट्रिया के इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की मुख्य शोधकर्ता सिल्विया क्रेमर के मुताबिक फंगस के संपर्क में आने के बाद चींटियों का व्यवहार बदल गया. बीमार चींटियां अपने साथियों से दूर रहने लगीं ताकि उनकी बीमारी दूसरों को न लग जाए. बीमार चींटियां साथ रहने लगीं और मुख्य दल से एकदम अलग-थलग हो गईं.

बीमार चींटियां ख़ासकर शिशु और रानी चींटियों से अलग रहने लगीं ताकि उनकी जिंदगी ख़तरे में न आए. ऐसा करने की प्रक्रिया में बीमार चींटियां काम या तो बंद कर देती हैं या उसे न्यूनतम कर देती हैं, जिससे वो दल से दूर रह सकें. ये हम लोगों की Sick leave से मिलती-जुलती प्रक्रिया है.

एंटीबॉडी की भी समझ

शोध में पाया गया कि अक्सर बाहर खाना इकट्ठा करने वाली चींटियां पैथोजन के संपर्क में आती और बीमार होती हैं. ऐसे में वो बाकी समूह से खुद को अलग-थलग कर लेती हैं. ये एक तरह से वैक्सीनेशन की तरह काम करता है. दोबारा उसी पैथोजन के संपर्क में आने पर चींटियों में इम्यूनिटी सिस्टम तेज़ी से काम करता है और पैथोजन उन पर बेअसर रहता है.

इंसानों को सीखने की जरूरत 

चींटियों के इस अनोखे व्यवहार को देखने के बाद शोधकर्ता कहते हैं कि हमें संक्रामक बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए चींटियों का व्यवहार अपनाने की जरूरत है. साथ ही साथ ये देखने की जरूरत है कि बीमार चींटी को दूसरी चींटियां आइसोलेशन में छोड़ नहीं देतीं, बल्कि उसकी सारी जरूरतें पूरी करती हैं और आपस में उसकी जिम्मेदारी भी बांट लेती हैं.

सबसे दिलचस्प तथ्य ये है कि चींटियों के दो पेट होते हैं. एक पेट में इकट्ठा खाना वो खुद खाती हैं तो दूसरे पेट का खाना वो साथियों के लिए ले जाती हैं. इस प्रक्रिया को Trophallaxis कहते हैं. हर चींटी को अपनी उम्र और योग्यता के मुताबिक अलग काम दिया जाता है. जैसे नई-नई मां बनी चींटियां शिशु चींटी की देखभाल तो अधिक उम्र की चींटियां खाना लाती हैं. बिना भाषा के भी ये आपस में संवाद करती हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘एंटरनेट’ नाम दिया गया है. एक खास हार्मोन के जरिए ये कनेक्शन बनता है और आपसी तालमेल का काम करता है.

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