परेशान और दुखी अस्पताल स्टाफ के साथ कैसे होगा मरीजों का इलाज

नई दिल्ली. कोरोना संक्रमण काल में काम का सबसे अधिक बोझ बढ़ा है मेडिकल फ्रटर्निटी पर. कोरोना की दूसरी वेव में जिस तरह संक्रमण के मामले बढ़े है उसका सीधा असर डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों पर पड़ा है. कोरोना के मरीजों का इलाज करते हुए डॉक्टर व नर्सिंग स्टाफ पीपीई कीट पहन कर घंटों इलाज करते है.

अबतक 1300 से अधिक डॉक्टरों ने गंवाई जान

इसके बाद भी न ही डॉक्टरों को और न ही नर्सिंग स्टाफ को उनके हर का पैसा मिल रहा है और न ही आराम. कई राज्यों में सरकार और डॉक्टरों के बीच ठनी हुई है. इसमें सबसे अव्वल नंबर पर है राजस्थान. यहां इंटर्न डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ से लेकर खुद डॉक्टर तक सरकार से नाराज चल रहे है.

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एक तरफ डॉक्टरों ने काली पट्टी बांध कर हड़ताल की हुई है. दूसरी ओर नर्सिंग स्टाफ भी अपनी मांगों को लेकर बीते कई दिनों से आंदोलनरत है. इसके अलावा कुछ समय पहले इंटर्न डॉक्टर भी सरकार से स्टाइपंड बढ़ाने की मांग को लेकर अभियान छेड़ चुके है. वैसे तो सरकार इंटर्न डॉक्टरों की मांग मान चुकी है और स्टाइपंड बढ़ाने का आश्वासन दे चुकी है मगर खबर लिखे जाने तक लिखित में इंटर्न डॉक्टरों को कुछ नहीं मिला है.

डॉक्टरों ने टाली हड़ताल

अजमेर स्थित जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. गोवरधन लाल सैनी ने बताया कि बीते दिनों एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अजमेर की विधायक अनिता भदेल द्वारा आरोप लगाया गया कि अस्पताल में होने वाली मौतों के लिए डॉक्टर जिम्मेदार है. वो यही नहीं रुकी उन्होंने आगे कहा कि इस मेडिकल कॉलेज में जो भी आता है वो मर कर जाता है.

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यहां भर्ती होने वाले मरीजों और मरने वालों का आंकड़ा बराबर है. वहीं विधायक के इस बयान पर डॉक्टरों में रोष है. डॉक्टर बीते सात दिनों से काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन कर रहे हैं. साथ ही विधायक से माफी मांगने की बात कर रहे है. इसी कड़ी में सोमवार से डॉक्टर 2 घंटे कार्य बहिष्कार करने वाले थे जिसे अभी के लिए टाल दिया गया है.

नर्सों की मांगों पर ध्यान नहीं

राजस्थान में सिर्फ डॉक्टर ही नहीं बल्कि नर्सिंग स्टाफ जिसकी भर्ती एनएचएम 2016 के तहत हुई उन्होंने भी दो घंटों के लिए कार्य बहिष्कार किया हुआ है. पूरे राज्य में नर्सिंग स्टाफ सुबह दो घंटे कार्य बहिष्कार करता है. इस दौरान कोरोना वॉर्ड में भी ड्यूटी नहीं दी जाती. दरअसल नर्सिंग स्टाफ की हालत भी इंटर्न डॉक्टरों जैसी है. नर्सिंग स्टाफ को मात्र 7900 रुपये हर महीने दिए जाते है. इस राशि में परिवार का पालन पोषण करना कठिन होता है.

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वहीं कोरोना काल में स्टाफ पर जिम्मेदारी बढ़ी है और संक्रमण का खतरा भी लगातार मंडरा रहा होता है. नर्सिंग स्टाफ की मांग है कि उनका वेतन बढ़ाकर 26500 किया जाए.इसके बाद भी सरकार इन 3300 नर्सिंग स्टाफ की मांगे नहीं मान रही है. कई दिनों से लगातार नर्सिंग स्टाफ अपनी मांगों को लेकर आंदोलन जारी रखे हुए है.

इंटर्न दे चुके हैं चेतावनी

डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के अलावा इंटर्न डॉक्टरों के साथ भी बीते कई महीनों से अच्छा व्यवहार सरकार नहीं कर रही है. सरकार इंटर्न डॉक्टरों की मांगों को लंबे समय तक टालती रही. हालांकि हाल ही में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपंड बढ़ाए जाने के संबंध में ऑल राजस्थान इंटर्न डॉक्टर एसोसिएशन के डॉ. विनोद शर्मा से. उन्होंने बताया कि इंटर्न को जस्थान में 233 रूपये रोज का पैसा मिलता है. सरकार के मुताबिक इससे अधिक पैसा एक मजदूर को दिया जाता है.

दुखद! दयनीय हालत में काम कर रहे इंटर्न डॉक्टर

आज कोरोना वायरस संक्रमण के दौर में इंटर्न डॉक्टर भी कोरोना वॉर्ड में ड्यूटी कर रहे है. अपनी जान जोखिम में डाल रहे है. सरकार ने कुछ समय पहले स्टाइपंड बढ़ाए जाने की मांग को मान लिया है मगर अबतक इसके लिए कोई लिखित आश्वासन नहीं मिला है. अगर सोमवार 31 मई तक आश्वासन नहीं मिलता है तो इंटर्न डॉक्टर सख्त कदम उठाने पर मजबूर हो सकते है.

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यानी कुल मिला कर अस्पताल में काम करने वाले हर स्टाफ को सरकार से कोई न कोई परेशानी जरूर है. ऐसे में राजस्थान सरकार को ये जरूर सोचना होगा कि वो इन परेशानियों को खत्म करे और स्वास्थ्य हालातों को राज्य में बेहतर बनाए. ये परेशानी मेडिकल फ्रेटर्निटी के समर्थन के बिना नहीं सुलझ सकती है. ऐसे में इस ओर ध्यान देना बहुत जरूरी है.

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