कोरोना काल में ड्यूटी करने को तैयार डिप्लोमा धारक डॉक्टर, उठाई ये मांग

नई दिल्ली. कोरोना संक्रमण काल में मेडिकल फ्रेटर्निटी दिन रात बिना छुट्टी के और ड्यूटी के अतिरिक्त घंटे देकर काम कर रही है. मगर जिस तरह से भारत में कोरोना संक्रमण के मामले दूसरी लहर में बढ़ते जा रहे हैं ये कहना गलत नहीं होगा की अभी हालात और खराब हो सकते हैं.

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वहीं यूनाइटेड डिप्लोमा डॉक्टर्स एसोसिएशन ने संभावना जताई है कि आने वाले समय में डॉक्टरों की भारी कमी का सामना भी देश को करना पड़ सकता है. यह दुर्भाग्य है कि हमारे देश में कोरोना से हालात बिगड़ते जा रहे हैं. हमारे देश में भी जरुरत है कि कुछ साहसिक और जरूरी कदम समय रहते उठाए जाएं ताकि कोविड महामारी से लड़ने में मदद मिल सके.

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इस बीच एसोसिएशन ने एक मांग उठाई है. एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. ऋषिकेश सिंह ने बताया कि वर्तमान और आने वाला समय बहुत गंभीर हो सकता है. ऐसे में जितने भी पीजी डिप्लोमा धारक डॉक्टर्स हैं वो कोरोना काल में अगले दो साल तक ड्यूटी करने को भी तैयार हैं.

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हालांकि पीजी डिप्लोमा धारक डॉक्टर की मांग है कि सरकार सभी डिप्लोमा धारकों को भी एमडी या एमएस में बदले. इसी के साथ जो पीजी डिप्लोमा धारक इस बार एग्जाम देने जा रहे थे उन्हें भी राहत दी जाए. इस समय भी 50 हजार डिप्लोमा धारक कोविड केयर सेंटर में ड्यूटी देने को भी तैयार हैं.

डिप्लोमा धारकों के साथ होता है भेदभाव

एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि एमसीआई के दिशानिर्देशों के कारण हजारों मेडिकल पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा धारक इस समय सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में सेवाएं देने से प्रतिबंधित किए गए हैं. हालांकि पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा धारक भी एमडी और एमएस के समान ही सेवाएं देने में सक्षम होते हैं.

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एसोसिएशन के मुताबिक लगभग 3000 से भी अधिक पीजी डिप्लोमा रेजिडेंट डॉक्टर अपनी सेवाएं कोरोना काल में दे रहे हैं. इसी के साथ उन्हें अपनी परीक्षाओं का भी इंतजार है वहीं पीजी डिप्लोमा धारक भी डीएनबी काउंसलिंग का इंतजार कर रहे हैं. ऐसे में कोरोना काल में भी कई योग्य जूनियर डॉक्टर अपनी सेवाएं देने का इंतजार कर रहे हैं. वर्तमान हालातों को देखते हुए जब अस्पतालों में मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है तो जूनियर डॉक्टर को सेवाएं देने से रोकना जनहित का फैसला नहीं है.

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इस संबंध में एमसीआई और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में कई बार बात रखी गई है. इसके बाद भी पीजी डिप्लोमा डॉक्टर को एमसीआई पॉलिसी में भी जगह नहीं दी जाती है. न ही एमसीआई की नीतियों में, शिक्षक पात्रता योग्यता, मेडिकल कॉलेजों में पदोन्नति आदि में उन्हें शामिल किया जाता है.

डिप्लोमा और एमडी डिग्री में एक साल का फर्क

बता दें की डिप्लोमा और एमडी या एमएस की डिग्री मिलने में मात्र एक साल का फर्क होता है. पीजी डिप्लोमा जहां दो साल का होता है वहीं एमडी एमएस की डिग्री तीन साल में पूरी हो जाती है. ऐसे में पीडी डिप्लोमा धारकों के साथ ऐसा भेदभाव करना तर्कसंगत नहीं है.

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