सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नाराज अभिभावक, कहा नहीं मिला न्याय

नई दिल्ली. स्कूल फीस को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दे दिया है. दो महीने के लंबे अंतराल के बाद ये फैसला आया है. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने फीस एक्ट 2016 को सही माना है. कोर्ट ने आदेश दिया कि जिन स्कूलों ने सत्र 2019-20 में 2016 एक्ट के मुताबिक फीस निर्धारित की थी. इन अभिभावकों को 15 फीसदी की छूट दिए जाने का फैसला दिया गया है. स्कूल अब 2020-21 की 85 फीसदी फीस अभिभावकों से ले सकेंगे.

इस मामले पर एडवोकेट अमित छंगाणी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक स्कूल संचालक जिन्होंने 2016 एक्ट के मुताबिक 2019-20 के सत्र में फीस तय की थी. अब 2020-21 के सत्र में उस फीस का 85 फीसदी ले सकते हैं. अभिभावकों को ये फीस 5 अगस्त तक स्कूलों में जमा करवानी होगी. जो छह किश्तों में भी दी जा सकती है.

स्कूल जाहे तो 15 फीसदी के अतिरिक्त फीस में छूट दे सकता है. अगर कोई छात्र फीस का भुगतान नहीं कर पाया है तो ऐसी स्थिति में स्कूल मैनेजमेंट छात्र को निकाल नहीं सकेंगे. स्कूलों के पास छात्रों का रिजल्ट रोकने का अधिकार भी नहीं होगा. खासतौर से 10वीं और 12वीं कक्षा के छात्रों के लिए. स्कूल अभिभावकों से अंडरटेकिंग भरवा सकते हैं जिसके बाद छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति होगी और रिजल्ट भी जारी किया जाएगा.

दोबारा खटखटाएंगे कोर्ट का दरवाजा

इस संबंध में संयुक्त अभिभावक संघ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अभिभावकों के लिए कोर्ट का दरवाजा दोबारा खटखटाया जाएगा. दरअसल फीस एक्ट 2016 को आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है उस एक्ट 2016 का पालन अधिकतर स्कूल करते नहीं है. ऐसे में ये सवाल भी खड़ा हो रहा है कि जिन छात्रों ने एक दिन भी ऑनलाइन या ऑफलाइन क्लास नहीं ली है उनकी फीस का क्या होगा. ऐसे छात्रों के अभिभावक फीस चुकाने के समर्थन में नहीं है.

संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अभिभावकों को बहुत आशा थी मगर वो अब निराशा में तब्दील हो चुकी है. 15 फीसदी छूट से अभिभावकों पर दोहरी मार पड़ी है. ऑनलाइन क्लास के लिए अभिभावकों को अधिक खर्चे करने पड़े जबकि स्कूल के उपर कोई दबाव नहीं पड़ा.

ऑफलाइन क्लास के दौरान स्कूल के जरिए ही सब संसाधन छात्रों को मुहैया कराए जाते थे जिनका इंतजाम अब घर पर रहते हुए अभिभावकों को करना पड़ रहा है. वहीं इस दौरान बच्चों ने स्कूल बिल्डिंग, टेबल, कुर्सी, कंप्यूचर, खेल मैदान आदि का कोई इस्तेमाल नहीं किया. ऐसे में इन सब की एक्स्ट्रा फीस अभिभावक क्यों दें. ये अभिभावकों के साथ न्याय नहीं है.

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