‘नमस्ते बापू’ कहकर गोडसे ने चलाई थी गोलियां, ‘हे राम’ कहकर दुनिया छोड़ गए बापू

rajesh ranjan singh
राजेश रंजन सिंह
(वरिष्ठ पत्रकार)

30 जनवरी 1948 का दिन था. जब नाथूराम गोडसे ने 3 गोलियां दागकर राष्ट्रपति महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी. इससे पहले भी गांधी जी की हत्या का प्रयास साउथ अफ्रीका से लेकर देश में पांच बार किया गया था. लेकिन नाथूराम गोडसे सफल हुआ. प्रार्थना-भाव में मग्न अपने राम की तरफ जाते गांधीजी के सीने में उसने तीन गोलियां उतार दी और ‘हे राम!’ कह गांधीजी वहां चले गए जहां से कोई वापस नहीं आता.

कहते हैं कि उस दिन गांधीजी ने देश के तत्कालीन गृहमंत्री रहे सरदार वल्लभ भाई पटेल को बातचीत के लिए बुलाया था. इसके लिए शाम 4 बजे का समय नियत किया गया था. चूंकि गांधी जी समय के बहुत ही पाबंद थे, इस बात का खास ख्याल रखते हुए सरदार पटेल अपनी बेटी मणिबेन के साथ तय समय पर गांधीजी से मिलने के लिए पहुंच गए थे. उन दिनों बिड़ला भवन में हर शाम 5 बजे प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाता था. इस सभा में गांधी जी जब भी दिल्ली में होते तो शामिल होना नहीं भूलते थे. उस दिन भी शाम के 5 बज चुके थे. गांधीजी सरदार पटेल के साथ बैठक में व्यस्त थे. तभी अचानक सवा 5 बजे गांधी जी की नजर घड़ी पर गई और उन्हें याद आया कि प्रार्थना के लिए वक्त निकलता जा रहा है.

पटेल के साथ बैठक समाप्त कर गांधी जी निकले. आभा और मनु के कंधों पर हाथ रखकर प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए मंच की तरफ आगे बढ़ रहे थे, तभी नाथूराम विनायक गोडसे गांधी जी के सामने आ गया. गोडसे ने अपने सामने गांधी जी को देखकर हाथ जोड़ लिया और कहा- ‘नमस्ते बापू!’, तभी बापूजी के साथ चल रही मनु ने कहा- भैया, सामने से हट जाओ बापू को जाने दो, पहले से ही देर हो चुकी है. 

Mahatma Gandhi’s followers mourn his death and pay their last respects to him. (file photo)

अचानक गोडसे ने मनु को धक्‍का दे दिया और अपने हाथों में छुपा रखी छोटी बैरेटा पिस्टल गांधीजी के सामने तान दी, और देखते-ही-देखते गांधीजी के सीने पर एक के बाद एक तीन गोलियां दाग दीं. दो गोलियां बापू के शरीर से होती हुईं बाहर निकल गईं, जबकि एक गोली उनके शरीर में ही फंसकर रह गई, और गांधीजी वहीं पर गिर पड़े और उनके मुंह से सिर्फ दो शब्द ही निकले ”हे राम”.

सुप्रीम कोर्ट ने नहीं, प्रिवी कौंसिल ने ठुकरा दी थी गोडसे क अपील

15 नवम्बर, 1949 को गोडसे को नारायण दत्तात्रेय आप्टे के साथ अम्बाला में फाँसी दे दी गई. उस वक़्त की सरकार सिर्फ़ 71 दिन और इन्तज़ार कर लेती, तो गोडसे और आप्टे को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का मौक़ा मिल जाता. उस वक़्त हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट ही नहीं थी. 21 जून, 1949 को पंजाब की हाई कोर्ट ने दोनों की मौत की सज़ा सुनाई थी.

file photo

सुप्रीम कोर्ट की जगह उस वक़्त प्रिवी कौंसिल हुआ करती थी. प्रिवी कौंसिल ने गोडसे और आप्टे की अपील न सुनने का फ़ैसला लिया. प्रिवी कौंसिल की मियाद 26 जनवरी, 1950 तक ख़त्म हो जाने वाली थी. इतने कम वक़्त में अपील का फ़ैसला नहीं हो सकता था, इसलिये प्रिवी कौंसिल ने अपील नहीं सुनी.

71 दिन बाद सुप्रीम कोर्ट का गठन होना था. गोडसे और आप्टे को सुप्रीम कोर्ट में अपील का मौक़ा देने के लिये 71 दिन का इन्तज़ार किया जाना सरकार को मन्ज़ूर नहीं था. इसलिये सुप्रीम कोर्ट के गठन के 71 दिन पहले गोडसे और आप्टे को फाँसी पर लटका दिया गया.

Rajesh Ranjan Singh

Sr. Journalist, Writer, Delhi College of Arts & Commerce/Delhi University alumni.

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