आपके घर में भी है पल्यूशन जो बना सकता है सीओपीडी का शिकार

नई दिल्ली. सर्दियों में मौसम में सांस संबंधित कई तरह की दिक्कतें सामने आने लगती हैं. इसी में सीओपीडी भी एक है. सीओपीडी यानी क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज. ये एक गंभीर बीमारी है. इस बीमारी में श्वसन प्रक्रिया बाधित होती है. जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक ऐसे कंपाउंड के संपर्क में रहता है जो कि फेंफड़ों में परेशानी पैदा करता है, इस कारण सीओपीडी की परेशानी सामने आती है.

सीओपीडी में दो तरह की स्थितियां आती हैं- एक क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस और एम्फिसेमा. मध्यम उम्र के या अधिक उम्र के बुजुर्ग जिन्हें धुम्रपान करने की आदत होती है. उन लोगों को सीओपीडी होने का खतरा अधिक मंडराता रहता है. वैसे ब्रॉन्काइटिस और एम्फिसेमा एक साथ ही होती हैं. इस बीमारी की गंभीरता हर व्यक्ति में अलग अलग स्तर की होती है.

सीओपीडी में प्रदूषण की भूमिका

सीओपीडी का खतरा धूम्रपान करने वालों में अधिक होता है. वहीं सैकेंडहैंड स्मोक या पैसिव स्मोक ( जो खुद सिगरेट नहीं पीते मगर सिगरेट के धुएं के संपर्क में रहते हैं) के कारण भी सीओपीडी का खतरा बढ़ता है. सिर्फ बाहरी प्रदूषण ही सीओपीडी का कारण नहीं होता. दरअसल घर में होने वाले इंडोर प्रदूषण के कारण भी सीओपीडी हो सकता है. आंकड़ों में मुताबिक वैश्विक स्तर पर घर के अंदर और आसपास मौजूद वायु प्रदूषण के कारण सालाना लगभग 70 लाख (7 मिलियन) लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है.

इस संबंध में एन्वायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (ईपीए) की मानें तो हम घरों और अन्य इमारतों में जिस हवा को सांस के जरिए शरीर में लेते हैं वो बाहरी हवा की तुलना में कहीं ज्यादा प्रदूषित हो सकती है. दरअसल कई सारे विकासशील देश हैं जहां अब भी लोग खाना पकाने के लिए कोयला, केरोसिन तेल और लकड़ी जैसी चीजों का उपयोग करते हैं.

इन ईंधनों का असर सीधा फेंफड़ों पर होता है. घर में मौजूद ये चीजें इंडोर प्रदूषण का स्त्रोत होती हैं. ये हवा में गैस या ऐसे कण छोड़ते हैं जो सेहत के लिए नुकसान देह होते हैं. इसमें लकड़ी का चूल्हा, बर्नर, वॉटर हीटर, ड्रायर आदि शामिल है. ये सभी ऐसे उत्पाद हैं जो घर में कार्बन डाइऑक्साइट, कार्बन मोनेऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड गैसें छोड़ते हैं. इन गैसों की मदद से अस्थमा और सांस संबंथित बीमारियां होती हैं.

घर में रहते हुए भी कई बार बायोलॉजिकल प्रदूषण से सामना हो जाता है. इसमें फफूंद, पोलन्य यानी पराग कण, पालतू जानवरों के बाल, धूल-मिट्टी के कण, कॉकरोच के कण भी शामिल हो सकते हैं. आमतौर पर मच्छरों, कॉकरोच या अन्य कीड़ों को मारने के लिए कीटनाशक स्प्रे का इस्तेमाल किया जाता है. इस सभी का व्यक्ति की श्वसन प्रणाली पर प्रतिकूल असर पड़ता है. बिल्डिंग निर्माण में उपयोग होने वाली भी कई ऐसी चीजें है जैसे ऐसेबेस्टॉस जो हमारे श्वसन को खराब करने का काम करती है.

इंडोर प्रदूषण को ऐसे करें कंट्रोल

घर में रहते हुए अनजाने में जो प्रदूषण होता है उसको रोकने के लिए कई तरह के ऐहतियाती कदम उठाए जा सकते हैं. ऐसे में खाना बनाने के लिए बेहतर उपकरणों का उपयोग करें. घर में नमी को भी 50 प्रतिशत से नीचे रखना चाहिए. ऐसा करने के लिए ह्यूमिडिफायर की मदद ली जा सकती है. रसोई में भी नमी के स्तर को बरकरार रखना है तो एग्जॉस्ट फैन का इस्तेमाल करने की आदत बनाएं. वहीं मच्छरों या अन्य कीड़े मारने की दवाओं और स्प्रे के इस्तेमाल से भी बचना चाहिए.

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