श्मशान घाटों के कर्मचारियों को मिला जीवन बीमा, इस संस्था ने उठाया जिम्मा

नई दिल्ली. श्मशान घाटों में जलने वाली लाशों की संख्या में बढ़ोतरी होने के बाद कई फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. कोरोना संक्रमण से मरने वालों की, उनके रिश्तेदारों की, कोरोना संक्रमितों का इलाज करने वाले डॉक्टर व मेडिकल स्टाफ की बात हर जगह हो रही है. लेकिन कोरोना संक्रमितों का अंतिम संस्कार करने वालों का कहीं कोई जिक्र नहीं है. बीते साल भर से अपनी व अपने परिवार की जान पर खेलकर श्मशान घाट के कर्मचारी कोरोना मृतकों का अंतिम संस्कार पूरे विधि विधान से करवा रहे हैं.

कोरोना संक्रमण काल में श्मशान घाट के कर्मचारी भी अनसंग वॉरियर्स के रुप में सामने आए हैं. कोरोना संक्रमण काल में जहां मृतकों के परिजन उनकी अस्थियों को लेने से भी कतरा रहे हैं, वहीं श्मशान घाट के कर्मचारी पूरी लगन से अपने कर्तव्य को पूरा करने में जुटे हुए है. ऐसे ही श्मशान घाट के कर्मचारियों के लिए सामाजिक संस्था ‘सरोकार’ ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया है. मध्यप्रदेश के भोपाल में श्मशान घाटों व कब्रिस्तान में कोरोना वायरस के कारण जान गंवाने वालों का अंतिम संस्कार करने वाले कर्मचारियों का जीवन बीमा करवाया है. श्मशान घाट और कब्रिस्तान के कुल 50 कर्मचारियों के लिए दो-दो लाख रुपये का बीमा हुआ है.

कुल बीमा एक करोड़ रुपये का

इन 50 कर्मचारियों में कुल चार महिलाएं भी शामिल हैं. दो महिलाएं श्मशान घाट पर काम करती हैं जबकि दो महिलाएं कब्रिस्तान में काम करती हैं. इनके अलावा एक कर्मचारी जिनकी उम्र 61 वर्ष की है. कंपनी पॉलिसी के कारण उनका जीवन बीमा नहीं हो सका है. मगर उनकी जिम्मेदारी संस्था ने उठाने का फैसला किया है. भाजपा के प्रदेश मंत्री और सरोकार संस्था के अध्यक्ष राहुल कोठारी ने बताया कि हमारे देश में संस्कारों को विशेष महत्व दिया जाता है. अंतिम संस्कार का भी अपना ही महत्व है. आज जब अपने अपनो को छूने से कतरा रहे हैं तब ये कर्मचारी अपने कर्तव्यों को पालन कर रहे हैं. ये वो लोग हैं जिनके बारे में कभी किसी व्यक्ति को विचार भी नहीं आता. कोरोना संक्रमण के काल में जब हर तरफ आज के समय में इनके जीवन को सुरक्षित करना बहुत जरूरी है. इस संबंध में उन्होंने ट्वीट भी किया है.

कई गुना बढ़ा काम

इन दिनों जिस तरह हर तरफ मौत का मंजर बना हुआ है तो श्मशान घाटों में भी काम काफी बढ़ गया है. पहले जहां कुछ ही अंतिम संस्कार किए जाते थे अब ये संख्या कई गुना बढ़ गई है. कर्मियों के हाथों में लकड़ियां उठाते-उठाते छाले तक पड़ गए. कई दिनों तक अतिरिक्त घंटों तक काम करना पड़ रहा है.

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