कृषि कानूनों पर विवाद… हिंसा…साजिश की खुलती परतें और कमजोर होता आंदोलन

श्वेता ए चतुर्वेदी (स्वतंत्र पत्रकार)”

नए कृषि कानून को लेकर अपना-अपना नजरिया है… केंद्र सरकार का दावा है कि ये कानून किसानों के हित में है… तो इसे किसान विरोधी कहने वालों की तादाद भी दिनों-दिन लंबी होती जा रही है… अन्नदाताओं तो पहले ही इसके खिलाफ मोर्चा खोल आंदोलन पर उतर चुके हैं और सरकार पर इसे वापस लेने का दबाव बना रहे हैं… लेकिन संशोधन के लिए तैयार सरकार कृषि कानून को वापस लेने को तैयार नहीं है… तो किसान भी अपनी मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए… केंद्र सरकार और आंदोलनकारी अन्नदाता अपने-अपने स्टैंड पर डटे हैं… और ये तकरार लगातार लंबी होती जा रही है… लेकिन आंदोलन लंबा खिंचने की वजह से अब ये कमजोर भी पड़ने लगा है…

केंद्र सरकार Vs किसान में सुप्रीम कोर्ट की ‘एंट्री’

सरकार और किसानों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद भी जब कोई रास्ता नहीं निकला तो देश की सर्वोच्च अदालत एक्शन में आई… सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी को तीनों विवादित कृषि कानूनों को लागू करने पर 2 महीने की रोक लगाते हुए तीन सदस्यीय एक कमेटी का गठन भी किया… कोर्ट ने इस कमेटी से सभी पक्षों से बातचीत के बाद 2 महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा है.

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित कमेटी अब तक कई दौर की बैठक कर चुकी है… जिसमें कृषि कानूनों को लेकर पश्चिम बंगाल समेत देश के आठ राज्यों के 12 किसान संगठनों और किसानों के साथ विचार-विमर्श किया. तीन सदस्यीय कमेटी सभी पक्षों के साथ आमने-सामने और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चर्चा में जुटी है, ताकि समस्या का जल्दी से जल्दी समाधान निकाला जा सके.

गणतंत्र दिवस हिंसा का ‘साजिश कनेक्शन’

किसान आंदोलन की साख को गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा ने काफी नुकसान पहुंचाया. लाल किला हिंसा से लेकर पुलिसकर्मियों पर हमला और ट्रैक्टर रैली के दौरान नियम कायदे की धज्जियां उड़ाने को लेकर किसान आंदोलन और उसकी अगुवाई कर रहे नेताओं पर सवाल उठने लगे. जांच के दौरान पुलिस ने कई किसान नेताओं के खिलाफ सबूतों के बिनाह पर केस दर्ज किया और फिर उन पर शिकंजा कसने लगा. अब तक हिंसा के मामले में कई लोग जेल की हवा खा रहे हैं. हिंसा की इस घटना के बाद किसान आंदोलन कमजोर पड़ने लगा.

साजिशकर्ताओं पर कसता शिकंजा और खुलती परतें

जब पुलिस ने दिल्ली हिंसा के मामले में केस दर्ज कर उसकी जांच शुरु की, तो हिंसा के पीछे साजिश की परतें एक-एक कर खुलने लगी. गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ और सबूतों की कड़ियां जोड़ने के बाद पुलिस को इसके पीछे गहरी साजिश के सुराग मिले. नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे लोगों को साजिशन भड़काने, गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर उपद्रव के लिए उकसाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब करने के लिए तैयार की गई टूलकिट बनाने से लेकर इसे सोशल मीडिया पर फैलाने वाले आरोपियों पर पुलिस ने शिकंजा कसना शुरु किया. इस पूरे मामले की मुख्य साजिशकर्ता एक जलवायु कार्यकर्ता दिशा रवि को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया गया… पुलिस ने दिशा की गिरफ्तारी के बाद ट्वीट कर बताया कि उसने ही खालिस्तान समर्थित संगठनों व अन्य साजिशकर्ताओं के साथ मिलकर टूलकिट तैयार किया और इसे आगे ट्वीट कराया. आरोप है कि दिशा ने ही ग्रेटा थनबर्ग को टूलकिट डाक्यूमेंट भेजा. टूलकिट में 26 जनवरी हिंसा को लेकर साइबर स्ट्राइक की भी बात लिखी गई थी.

दिल्ली पुलिस दिशा के करीबियों की तलाश कर रही है. साथ ही एक व्हाट्सएप ग्रुप के मेंबर्स की भी पहचान की जा रही है. दिशा का मोबाइल फोन और लैपटाप जब्त कर लिया गया है. जबकि उसके मोबाइल के डिलिडेट डेटा को रिकवर करने की कोशिश की जा रही है, ताकि साजिश से जुड़ा एक-एक सच सामने आ सके. पुलिस के मुताबिक किसान आंदोलन को भड़काने के लिए टूलकिट अभियान चलाया गया. जिसमें विदेश में रहने वाले खालिस्तानी समर्थकों ने कई लोगों को शामिल कर साजिश रची और उनके जरिये टूलकिट अभियान को अंजाम दिया.

टूट-फूट, कन्फ्यूजन और किसान नेताओं का यू-टर्न

टैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के बाद आंदोलन कर रहे किसान संगठनों में फूट खुलकर सामने आ गई. कई किसान संगठनों ने इसके विरोध में आंदोलन को वापस लेने का ऐलान कर दिया. तो पुलिस के बढ़ते प्रेशर के बीच बाकी संगठनों पर भी पीछे हटने का दबाव बढ़ने लगा. एक्शन के मूड में नजर आ रही पुलिस ने कई लेयर की तारबंदी, बैरिकेडिंग कर किसान संगठनों पर दबाव बढ़ाया तो कई पर कानून का फंदा कसने की तैयारी भी की. लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत के आंसू ने रातोंरात पासा पलटा और किसान आंदोलन में नई जान फूंक दी. उसके बाद से किसानों की महापंचायत हो रही है, जगह- जगह किसान आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान हो रहा है. लेकिन इस महापंचायत वाले समर्थन से किसान आंदोलन को जाट किसानों का आंदोलन भी कहा जाने लगा है. जिससे आंदोलन के कमजोर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा अब राकेश टिकैत के समर्थन में खड़ा नजर आ रहा है, जिससे उनका कद बढ़ा है. लेकिन इस बीच राकेश टिकैत ने सरकार को पहले कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए 2 अक्टूबर का वक्त दिया, लेकिन जब संयुक्त किसान मोर्चा ने उस पर सवाल उठाए तो उन्होंने एक बार फिर यू टर्न ले लिया. ऐसे में एक बार फिर ये सवाल उठने लगे कि आखिर कब तक किसान नेताओं का यूनिटी शो चलेगा या फिर उनमें फूट के बाद किसान आंदोलन कमजोर होगा. इस सवाल का जवाब तो आने वाला वक्त ही देगा.

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