चैत्र नवरात्र 2021 : अष्टमी और नवमी पर इस समय करें कन्या पूजन, ये है शुभ समय

नई दिल्ली. देवी मां की आराधना के नौ दिन यानी नवरात्र की शुरुआत हो चुकी है. देवी मां अश्व पर सवार होकर कई शुभ संयोग साथ लेकर आई हैं. नवरात्र के दौरान पूजा पाठ करने से मां का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है. भक्त अखण्ड ज्योत जलाते हैं और विधि विधान से मां भगवती का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. नवरात्र के दौरान पूजा पाठ के अलावा कन्या पूजन का भी विशेष महत्व होता है.

कन्या पूजन करने से नवरात्र की पूजा पूर्ण की जाती है. इतना ही नहीं कन्या पूजन करने से मां अन्नपूर्णा और महालक्ष्मी की कृपा भी बनी रहती है. इसलिए कन्या पूजन का महत्व बहुत बताया गया है. दरअसल कन्याओं को माता का रूप मानकर उन्हें भोग लगाया जाता है और उन्हें पूजा जाता है.

इस बार सप्तमी तिथि सोमवार 19 अप्रैल से शुरु होकर मंगलवार रात 12 बजकर 01 मिनट तक रहेगी. इसके बाद अष्टमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी. 21 अप्रैल को नवमी तिथि रहेगी. नवमी तिथि भी मध्यरात्रि 12 बजकर 32 मिनट तक जारी रहेगी. ऐसे में इस बार अष्टमी और नवमी दोनों ही तिथियों पर व्रत और कन्या पूजन के लिए समय अनूकूल मिल रहा है.

नौ कन्याओं को कराया जाता है भोज

कन्या पूजन में दो से 10 वर्ष की कन्याओं को भोज करवाया जाता है. कथाओं के मुताबिक भोज करने वाली कन्याओं की संख्या नौ होनी चाहिए जो की शुभ संख्या मानी जाती है. हालांकि अपनी श्रृद्धा और भाव के मुताबिक व्यक्ति कम या अधिक कन्याओं को भोज करवा सकते हैं. मान्यताओं के अनुसार 10 वर्ष से कम की कन्याओं को महत्वपूर्ण माना जाता है.

दरअसल दो वर्ष की कन्या को कन्या कुमारी, तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति, चार साल की कन्या को कल्याणी, पांच साल की कन्या को रोहिणी, छह साल की कन्या को कालिका, सात साल की कन्या को चंडिका, आठ साल की कन्या को शांभवी, नौ साल की कन्या को दुर्गा और 10 साल की कन्या को सुभद्रा का स्वरूप माना जाता है. ऐेसे में कन्या भोज कराते समय इन कन्याओं का होना शुभ माना जाता है.

ऐसे करें पूजा

कन्या पूजन के दिन प्रात: काल स्नान करें. इसके बाद प्रसाद में खीर, पूड़ी, हलवा, चने, आदि तैयार करें. इस प्रसाद का भोग सबसे पहले मां दुर्गा को लगाएं. इसके बाद कन्याओं को बुलाकर उनके पैर शुद्ध जल से धोएं. उन्हें साफ व स्वच्छ आसन पर बैठाएं. कन्याओं को मां दुर्गा को भोग में लगाया हुआ प्रसाद परोसें. नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोज कराना आवश्यक माना जाता है. इस बालक को लंगूर या भैरव बाबा का रूप कहा जाता है.

कन्याओं को भोजन कराने के बाद उन्हें टीका लगाकर उनकी कलाई पर कलावा बांधना चाहिए. कन्याओं को विदा करते समय अनाज, रुपया, वस्त्र आदि भेंट स्वरूप देना चाहिए. विदा करते समय उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद भी लेना चाहिए.

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