अंबेडकर जयंती 2021: बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म ही क्यों अपनाया, जानने के लिए पढ़ें खबर

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का आज यानि 14 अप्रैल को जन्मदिन है। भारतीय संविधान के निर्माता बीआर अंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के महू में 14 अप्रैल 1891 को हुआ था। वह एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने न सिर्फ संविधान का निर्माण किया बल्कि देश के सबसे बड़े बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत के लोगों के लिये डॉ भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस और उनके योगदान को याद करने के लिये 14 अप्रैल को एक उत्सव से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ लोगों के द्वारा अंबेडकर जयंती को मनाया जाता है।

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हिन्दू धर्म की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाते हुए भारतीय संविधान के जनक डॉ बीमराव अम्बेडकर ने एक बड़े सम्मेलन में अपने 3,80,000 साथियों के साथ हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था। 1950 के दशक में ही बाबा साहेब बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध सम्मेलन में भाग लेने श्रीलंका (तब सीलोन) गए। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने अपने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया।

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इस मौके पर उन्होंने जो 22 प्रतिज्ञाएं लीं उससे हिंदू धर्म और उसकी पूजा पद्धति को उन्होंने पूर्ण रूप से त्याग दिया। डॉक्टर अंबेडकर के साथ लाखों दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाया और ये पूरी दुनिया में धर्म परिवर्तन की सबसे बड़ी घटना थी। हालांकि खुद उन्होंने इसे धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि धर्म-जनित शारीरिक, मानसिक व आर्थिक दासता से मुक्ति बताया।

Ambedkar Museum, Delhi

बौद्ध धर्म ही क्यों

चारों धर्मों की तुलना डॉ. आंबेडकर ईश्वरीय वाणी के संदर्भ में वे लिखते हैं कि ‘इन चार धर्म प्रवर्तकों के बीच एक और भेद भी है। ईसा और मुहम्मद दोनों ने दावा किया कि उनकी शिक्षा ईश्वर या अल्लाह की वाणी है और ईश्वर वाणी होने के कारण इसमें कोई त्रुटि नहीं हो सकती और यह संदेह से परे है। कृष्ण अपनी स्वयं की ही धारण की हुई उपाधि के अनुसार विराट रूप परमेश्वर थे और उनकी शिक्षा चूंकि परमेश्वर के मुंह से निकली हुई ईश्वर वाणी थी, इसलिए इसमें किसी प्रकार की कोई गलती होने का प्रश्न ही नहीं उठता।’

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इन तीनों की तुलना बुद्ध से करते हुए आंबेडकर लिखते हैं कि ‘बुद्ध ने अपनी शिक्षा में इस तरह के अंतिम सत्य होने का दावा नहीं किया। ‘महापरिनिर्वाण-सूत्र’ में उन्होंने आनन्द को बताया कि उनका धर्म तर्क और अनुभव पर आधारित है।’ बुद्ध ने यह भी कहा है कि उनके अनुयायियों को उनकी शिक्षा को केवल इसीलिए सही और जरूरी नहीं मान लेना चाहिए कि यह उनकी (बुद्ध की) दी हुई है। यदि किसी विशेष समय और विशेष स्थिति में इस शिक्षा में से कोई बात सटीक न मालूम होती हो तो इसमें उनके अनुयायी सुधार कर सकते हैं और कुछ चीजों का त्याग कर सकते हैं।

हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं

अंबेडकर का जन्म हिन्दू जाति में अछूत और निचली मानी जाने वाली महार जाति में हुआ था। उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त छूत प्रथा को खत्म करने के लिए न सिर्फ सामाजिक बल्कि कानूनी रास्ता भी अख्तियार किया। वे मानते थे कि कानून में बदलाव लाकर ही दिल और दिमाग में बदलाव संभव है। उनके बौद्ध धर्म अपनाने के पीछे बौद्ध धर्म में छुआछूत और जाति प्रथा जैसी कुरीति का न होना था।

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अंबेडकर जिस ताकत के साथ दलितों को उनका हक दिलाने के लिए उन्हें एकजुट करने और राजनीतिक-सामाजिक रूप से उन्हें सशक्त बनाने में जुटे थे, उतनी ही ताकत के साथ उनके विरोधी भी उन्हें रोकने के लिए जोर लगा रहे थे। लंबे संघर्ष के बाद जब अंबेडकर को भरोसा हो गया कि वे हिंदू धर्म से जातिप्रथा और छुआ-छूत की कुरीतियां दूर नहीं कर पा रहे तो उन्होंने वो ऐतिहासिक वक्तव्य दिया जिसमें उन्होंने कहा कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं।

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